जिम्मेदार कौन? Who is Responsible? मजबूर मजदूरों की कहानी, Forced worker Story by Jitendra Kholiya.
Looking
at these pictures, it would probably say, life is a journey..
The
Corona crisis has marginalized the lives of the poor and migrant laborers. The
lockdown in the country exceeded 50 days. Even then, the heat-laden roads were
not emptied by the worker's footsteps. Even now, laborers from different parts
of the country are traveling on foot to reach their villages. Some are barefoot
and some on a bicycle. Some enlisted the help of Jugaad to make the journey of
wife-children easier, whose pictures and videos you must have seen too; For
example, the child lies on the wheel suitcase and the mother is dragging him.
The
latest picture is of a disabled child, who is traveling in this hot weather,
lying in a piece of plastic tied to his father's bicycle, looking at the sky
and the scorching sun. Perhaps the child's eyes are looking at you in this
photo. And one question is asking, is this her beautiful childhood?
The
working class is paying the highest price for lockdown. This class is hungry,
helpless. The system has broken the soul of this class, but these are going on
every day. On the same roads that he has built. Every day a picture comes, every
day it seems that it cannot be too much. But we are proved wrong. This pain
feels immeasurable. And the helplessness of not doing anything stings more than
that.
These
die-hard workers are not dying from an epidemic. They are being killed by a
failed system. The hard-working bread-eating class is a victim of a weak
system. These workers, who build a city, have to go on foot to go home. A
burden on his head and a child in his lap, whose future seems to be black… It
breaks all hearts. It seems that they have no house at all.
In one of
his articles, Premji said, I am not using the word unforgivable lightly. The
blame is ours; it is the society we have built. This tragedy is one of the most
painful signs of the great calamity that our citizens are suffering from the
most vulnerable and the poorest sections.
After
some time everything will become normal for all of us and we may forget that
something like this happened with the workers. But, these workers will not
forget. These pictures will not let them forget.
इन तस्वीरों को देख शायद ये ही कहेंगे, जिंदगी एक सफर है सुहाना ..
कोरोना संकट ने गरीबों और प्रवासी मजदूरों की जिंदगी को हाशिए पर लाकर पटक दिया है। देश में लॉकडाउन को 50 दिन से ज्यादा हो गए। तब भी गर्मी से तपती सड़कें मजदूर के कदमों से खाली नहीं हुईं। अब भी देश के अलग-अलग हिस्सों से मजदूर अपने देस/गांव पहुंचने के लिए पैदल ही सफर कर रहे हैं। कुछ नंगे पैर हैं तो कुछ साइकिल पर। कुछ ने बीवी-बच्चों के सफर को आसान बनाने के लिए जुगाड़ की मदद ली, जिसकी कई तस्वीरें और वीडियो आपने भी देखे होंगे! जैसे- बच्चा पहिए वाले सूटकेस पर लेटा है और मां उसे घसीट रही है।
ताजा तस्वीर एक दिव्यांग बच्चे की है, जो इस गर्म मौसम में अपने पिता की साइकिल से बंधे प्लास्टिक के टुकड़े में लेटकर आसमान को और तपते सूरज को देखकर सफर कर रहा है। शायद इस फोटो में बच्चे की आंखें आपको-हमको देख रही हैं। और पूछ रही हैं एक सवाल क्या यही उसका खूबसूरत बचपन है?
मज़दूर वर्ग को लॉकडाउन की सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है. ये वर्ग भूखा है, बेबस है, लाचार है. सिस्टम ने इस वर्ग की आत्मा तोड़ दी है, लेकिन ये हर दिन चल रहे हैं. उन्हीं सड़कों पर, जिन्हें इन्होंने बनाया है. हर दिन एक तस्वीर आती है, हर दिन लगता है कि इससे ज्यादा अति नहीं हो सकती है. मगर हम ग़लत साबित हो जाते हैं. ये दर्द अथाह महसूस होता है. और कुछ ना कर पाने की बेबसी उससे कहीं ज्यादा चुभती है.
ये हर दिन दम तोड़ने वाले मज़दूर एक महामारी से नहीं मर रहे हैं. ये एक नाकाम सिस्टम के द्वारा मारे जा रहे हैं. मेहनत से रोटी कमाकर खाने वाला वर्ग कमज़ोर व्यवस्था का शिकार है. एक शहर का निर्माण करने वाले इन मज़दूरों को घर जाने के लिए पैदल ही निकलना पड़ रहा है. सिर पर बोझा और और गोद में बच्चा, जिसका भविष्य काला नज़र आ रहा है….ये सब दिल तोड़ देता है. ऐसा लगता है कि इनका कोई घर ही नहीं!
अपने एक लेख में प्रेमजी ने कहा, 'मैं अक्षम्य शब्द का इस्तेमाल हल्के में नहीं कर रहा हूं। दोष हमारा है, हमने जिस समाज को बनाया है, उसका है। यह त्रासदी बहुत बड़ी विपदा के बेहद कष्टदायक संकेतों में से एक है, जिसे हमारे वे नागरिक भुगत रहे हैं, जो बेहद कमजोर और सबसे गरीब तबके के हैं।
कुछ समय बाद हम सभी के लिए सब सामान्य हो जाएगा और हो सकता है कि हम भूल भी जाएं कि मज़दूरों के साथ ऐसा भी कुछ हुआ था. लेकिन, ये मज़दूर नहीं भूलेंगे. ये तस्वीरें उन्हें भूलने नहीं देंगी.
कोरोना संकट ने गरीबों और प्रवासी मजदूरों की जिंदगी को हाशिए पर लाकर पटक दिया है। देश में लॉकडाउन को 50 दिन से ज्यादा हो गए। तब भी गर्मी से तपती सड़कें मजदूर के कदमों से खाली नहीं हुईं। अब भी देश के अलग-अलग हिस्सों से मजदूर अपने देस/गांव पहुंचने के लिए पैदल ही सफर कर रहे हैं। कुछ नंगे पैर हैं तो कुछ साइकिल पर। कुछ ने बीवी-बच्चों के सफर को आसान बनाने के लिए जुगाड़ की मदद ली, जिसकी कई तस्वीरें और वीडियो आपने भी देखे होंगे! जैसे- बच्चा पहिए वाले सूटकेस पर लेटा है और मां उसे घसीट रही है।
ताजा तस्वीर एक दिव्यांग बच्चे की है, जो इस गर्म मौसम में अपने पिता की साइकिल से बंधे प्लास्टिक के टुकड़े में लेटकर आसमान को और तपते सूरज को देखकर सफर कर रहा है। शायद इस फोटो में बच्चे की आंखें आपको-हमको देख रही हैं। और पूछ रही हैं एक सवाल क्या यही उसका खूबसूरत बचपन है?
मज़दूर वर्ग को लॉकडाउन की सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है. ये वर्ग भूखा है, बेबस है, लाचार है. सिस्टम ने इस वर्ग की आत्मा तोड़ दी है, लेकिन ये हर दिन चल रहे हैं. उन्हीं सड़कों पर, जिन्हें इन्होंने बनाया है. हर दिन एक तस्वीर आती है, हर दिन लगता है कि इससे ज्यादा अति नहीं हो सकती है. मगर हम ग़लत साबित हो जाते हैं. ये दर्द अथाह महसूस होता है. और कुछ ना कर पाने की बेबसी उससे कहीं ज्यादा चुभती है.
ये हर दिन दम तोड़ने वाले मज़दूर एक महामारी से नहीं मर रहे हैं. ये एक नाकाम सिस्टम के द्वारा मारे जा रहे हैं. मेहनत से रोटी कमाकर खाने वाला वर्ग कमज़ोर व्यवस्था का शिकार है. एक शहर का निर्माण करने वाले इन मज़दूरों को घर जाने के लिए पैदल ही निकलना पड़ रहा है. सिर पर बोझा और और गोद में बच्चा, जिसका भविष्य काला नज़र आ रहा है….ये सब दिल तोड़ देता है. ऐसा लगता है कि इनका कोई घर ही नहीं!
अपने एक लेख में प्रेमजी ने कहा, 'मैं अक्षम्य शब्द का इस्तेमाल हल्के में नहीं कर रहा हूं। दोष हमारा है, हमने जिस समाज को बनाया है, उसका है। यह त्रासदी बहुत बड़ी विपदा के बेहद कष्टदायक संकेतों में से एक है, जिसे हमारे वे नागरिक भुगत रहे हैं, जो बेहद कमजोर और सबसे गरीब तबके के हैं।
कुछ समय बाद हम सभी के लिए सब सामान्य हो जाएगा और हो सकता है कि हम भूल भी जाएं कि मज़दूरों के साथ ऐसा भी कुछ हुआ था. लेकिन, ये मज़दूर नहीं भूलेंगे. ये तस्वीरें उन्हें भूलने नहीं देंगी.
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